Sunday, 28 June 2015
READ SOME WHERE, LIKE TO SHARE.... Tuning in to the language of our bodies can be very enlightening & increases our intuition. So much can be revealed to us when we listen to the language of our bodies. Our bodies are always speaking, sending us messages through the way we move, the sensations that arise from within, and the gestures & expressions that we make when we are communicating with others. Tuning in to the language of our bodies can be very enlightening, especially as most communication is believed to take place nonverbally. It is also believed that the body never lies & that if we want to know the truth about ourselves & others, then we should listen to what our bodies have to say. Anyone who has ever flirted with someone they are attracted to has probably, at one point in time or another, brushed their hands through their hair or found themselves leaning forward to get closer to that person. Someone feeling defensive will tend to cross their arms over their chest, while a person who wants to withhold something may look away when speaking. If you want to know how you truly feel about a person or a situation, then it is a good idea to tune in to what you are feeling inside. Excitement, nervousness, anxiety & fear are just some of the messages that your body wants you to hear. Your body can also be a very reliable compass. Anyone who has ever been somewhere they don’t want to be has probably experienced their bodies trying to move them away from that particular circumstance. And while it can be very easy to talk ourselves into & out of choices we may make with our minds, it isn’t so easy to change the truth of our hearts that reside within our bodies. To begin tuning in to this subtle form of communication, start taking the time to notice what your body is telling you. Greet each feeling or sensation as a message carrying wisdom from your body. Tune in to what your body is telling you about the situations & people you encounter and listen to what others are communicating to you through their bodies. We already are subconsciously receptive to the language of our bodies, but when we choose to consciously pay attention, we hear & understand so much more about ourselves and the people around us.
Friday, 26 June 2015
https://www.facebook.com/pages/Dr-Vandana-Raghuvanshi/286488591442571
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Friday, 19 June 2015
ध्वनि और सात चक्र ================ ऊर्जा का ध्वनि रूप कभी नष्ट नहीं होता । आज भी विज्ञान कृष्ण की गीता को आकाश से मूल रूप में प्राप्त करना चाहता है । ध्वनि की तरंगे जल तरंगों की तरह वर्तुल (गोलाकार) रूप में आगे बढ़ती हैं । सूर्य की किरणें सीधी रेखा में चलती हैं, इनका मार्ग कोई भी अपारदर्शी माध्यम अवरुद्ध कर सकता है । जल तरंगें जल तक ही सिमित रहती हैं । लेकिन ध्वनि तरंगों को कोई माध्यम रोक नहीं पाता है । गर्भस्त शिशु भी ध्वनि स्पंदनों ग्रहण कर अभिमन्यु बन जाता है । प्रकृति ने शरीर को सात धातुओं में, सात चक्रों में , सप्तांग गुहाओं में श्रेणीबद्ध किया है ।ध्वनि को भी सात सुरों से अलंकृत किया है । सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड जो की ध्वनि अर्थात नाद पर ही आधारित है, सात ही लोकों में बटा हुआ है ।यथा: भु - भुव: - स्व: - मह: - जन: - तप: - सत्यम् ।शरीर के सात चक्रों की तुलना भी इन सात लोकों से की गयी है । जैसे सृष्टि और प्रकृति में संतुलन जरुरी है, उसी प्रकार शरीर तथा चक्रों में संतुलन आवश्यक है ।प्रत्येक चक्र पर वर्णमाला के वर्ण भी अभिव्यक्त होते हैं। इन वर्णों का , सात सुरों के स्पंदनों का चक्रों से विशिष्ठ सम्बन्ध होता है । दूसरी ओर प्रत्येक चक्र से शरीर के कुछ अवयव जुड़े हुए हैं । चक्र शरीर के विशेष शक्ति केंद्र हैं , अत: इनसे ही , आश्रित अवयवों की क्रियाओं का नियंत्रण होता है । अवयवों के रोगग्रस्त होने की दशा में चक्रों का संतुलन भी बिगड़ जाता है । चक्रों का सीधा सम्बन्ध हमारे आभामंडल से होता है । इसी आभामंडल से हमारा मन निर्मित होता है । आभामंडल अपने चारों ओर के वायुमंडल से ऊर्जाएं ग्रहण करता है । यहाँ से सारी ऊर्जाएं चक्रों से गुजरती हुई विभिन्न अंगों , स्नायु कोशिकाओं में वितरित होती है । मूलाधार और सहस्त्रार को छोड़कर सभी चक्र युगल रूप में होते हैं । एक भाग आगे की ओर तथा दूसरा भाग पीठ की ओर । साधारण अवस्था में सभी चक्र घड़ी की दिशा में घूमते हैं । हर चक्र की अपनी गति होती है । इसमें होने वाले स्पंदनों की आवृति ( frequency ) के अनुरूप ही चक्र का रंग होता है । चक्र का आगे वाला भाग गुण - धर्म से जुड़ा है । पृष्ठ भाग गुणों की मात्रा , स्तर और प्रचुरता से जुड़ा होता है । युगल का संगम रीढ़ केंद्र होता है । जहाँ इडा - पिंगला भी मिलती हैं । यही केंद्र अंत:स्रावी ग्रंथि (endocrine gland) से जुड़ा होता है । अनंत आकाश से तथा सूर्य से आने वाली ऊर्जाएं हमारे आभामंडल और चक्रों के समूह के माध्यम से हमारे स्थूल शरीर में प्रवेश करती है । अंत:स्रावी ग्रंथियों के नाम एवम् स्थान:- ======================== चक्र ग्रंथि स्थान --------- ----------- -------------- 7 सहस्त्रार पीनियल कपाल 6 आज्ञा पिच्युटरी (पीयुशिका) भ्रूमध्य 5 विशुद्धि थायराईड (गलग्रंथी) कंठ 4 अनाहत थायमस (बाल्य ग्रंथि) ह्रदय 3 मणिपूर पेनक्रियज (अग्नाशय) नाभि 2 स्वाधिष्ठान एड्रिनल ( जनन ग्रंथि) पेडू 1 मूलाधार गोनाड (अधिब्रक्क) रीढ़ का अंतिम छोर कार्य क्षेत्र ======= सहस्रार - ऊपरी मस्तिष्क, दाहिनी आँख, स्नायु तंत्र, शरीर का ढांचा, आत्मिक धरातल, सूक्ष्म ऊर्जा सइ सम्बन्ध, पूर्व जन्म स्मृति आदि । भ्रूमध्य - ग्रंथियों की कार्य प्रणाली, प्रतिरोध क्षमता, चेहरा तथा इन्द्रियों के कार्य, अंत:चक्षु , चुम्बकीय क्षेत्र, प्रज्ञा आदि । विशुद्धि - स्वर यंत्र , श्वसन तंत्र , अंत:श्रवण, टेलीपेथी, अंतर्मन आदि । अनाहत - रोग निरोधक क्षमता, ह्रदय, रक्त प्रवाह , दया - करुणा का केंद्र, अन्य प्राणीयों के प्रति सम्मान भाव आदि । मणिपुर - पाचन तंत्र, यकृत, तिल्ली , नाड़ी तंत्र , आंतें , बायाँ मस्तिस्क, बौद्धिक विकास आदि । स्वाधिष्ठान - प्रजनन तंत्र, गुर्दे , मूत्र , मल, विष विसर्ज्ञन, भावनात्मक धरातल, सूक्ष्म स्तर आदि । मूलाधार - विसर्जन तंत्र , रीढ़ , पैर ,प्रजनन अंग, जीवन ऊर्जा का मूल केंद्र, भय मुक्ति, शक्ति केंद्र । सातों केन्द्रों के रंग भी इन्द्रधनुष के रंगों के क्रम में होते हैं । हर रंग ध्वनि तरंगों की आवृति से बनता है । यह वैज्ञानिक तथ्य है । अत: हम ध्वनि तरंगों की आवृति नियंत्रित करके चक्र विशेष को प्रभावित कर सकते हैं । ध्वनि की अवधारणा में शब्द और भाव संगीत पर सवार होते हैं । अलग-अलग श्रेणी के शब्द जब संगीत की लय , ताल , और स्वर से मिलते हैं, तब विभिन्न चक्रों पर उनका प्रभाव भिन्न - भिन्न होता है । अस्वस्थ व्यक्ति के चक्रों का स्वरुप असंतुलित होता है । गति, आवृति, रंग, आभामंडल आदि संतुलित नहीं होते । तब संगीत की लय, भावनाओं के साथ जुड़कर संतुलन को ठीक करने का क्रम शुरू किया जाता है । कई बार रोग की स्थिति में असंतुलित चक्र सूक्ष्म शरीर से ऊर्जा खींचकर स्वस्थ होने का प्रयास करता है । रंगों की तरह संगीत के सात सुर भी सातों केन्द्रों से जुड़े होते हैं । प्रत्येक स्वर की आवृति , ताल, भी हर चक्र की अलग-अलग होती है । शब्द, भाव और ध्वनि अविनाभाव( आपस में संयुक्त ) होते हैं ।एक को बदलने पर शेष दोनों भी बदल जाते हैं । ध्वनि की एक विशेषता यह है कि ये चारों ओर फैलती जाती है । प्रत्येक व्यक्ति के शरीर से गुजरती जाती है । इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की ध्वनि भी हमारे शरीर से गुजरती रहती है । अत: हर व्यक्ति एक दूसरे को परिष्कृत करता जाता है । शब्द और ध्वनि मिलकर भावनाओं को ऊर्ध्वगामी बनाते हैं । इसी के साथ संगीत के सुरों का क्रम गहन से गहनतम होता जाता है । व्यक्ति खो जाता है । संगीत के स्पंदन और उसका गुंजन मणिपुर चक्र के माध्यम से शरीर में फैलता है । गर्भस्थ शिशु के साथ माँ का संवाद नाभि के जरिये ही बना रहता है । सातों सुरों का प्रभाव सीधा भी भिन्न-भिन्न केन्द्रों पर पड़ता है । नीचे मूलाधार पर "सा " , स्वाधिष्ठान पर " रे " , मणिपूर पर " ग " , अनाहत पर " म " , विशुद्धि पर " प " , तथा आज्ञा चक्र पर " ध " , के साथ सहस्त्रार पर " नि " का प्रभाव अलग-अलग सुर-लय के साथ पड़ता रहता है । मूलाधार शरीर की ऊर्जाओं का केंद्र है । ताल के साथ तरंगित होता है । तबला, ढोल, मृदंग जैसे संगीत पर थिरकता है । स्वाधिष्ठान भावनात्मक धरातल मूलाधार तथा मणिपुर के साथ स्पंदित होता है । लय हमेशां भावनात्मक भूमिका में कार्य करती है । अत: ऊपर अनाहत को भी प्रभावित करती है । विशुद्धि और अनाहत भीतरी सूक्ष्म शक्तियों का मार्ग खोलते हैं । आज्ञा-सहस्त्रार आत्मिक धरातल का संतुलन, शरीर-मन-बुद्धि का संतुलन , दृश्य-द्रष्टा भावों के प्रतिमान हैं । इनमें सुर-ताल-लय के साथ भावों का जुड़ना जरुरी है । विश्व भर में आज संगीत चिकित्सा की बहुत चर्चा है । संगीत चिकित्सा के अनुसार ताल शारीरिक और सुर भावनात्मक क्षेत्र को तथा लय बद्धता अंत:क्षेत्र को प्रभावित करते हैं । ध्वनि प्रत्येक चक्र की ऊर्जाओं को संतुलित करते हुए व्यक्ति को मन-वचन-शरीर से निरोग व आस्थावान बनाये रखती है।
Monday, 8 June 2015
योगवाशिष्ठ ग्रन्थ को महारामायण के नाम से भी जाना जाता है क्यों कि इसमेें महर्षि वाशिष्ठ ने भगवान् श्री राम को जीवन विज्ञान और योग विज्ञान की शिक्षा दी है ।उसमें ये बताया है कि चिज्जड़ ग्रंथि के टूटने पर सभी चक्र जाग्रत हो जाते हैं ।चिज्जड़ यानि (चित्त + जड़) अर्थात् चेतना का जड़ से पृथकता का अनुभव होना ।यही बात योगदर्शन के विभुतिपाद में वर्णित की गयी है ।अब चेतना की जड़ता से पृथकता कैसे हो इसके लिए एक विधि है , जो लिपिबद्ध नहीं की जा सकती ।योग दर्शन की किसी भी जिज्ञासा के लिए आपका स्वागत है ।......by Dr. Surendra Nath Panch
योग निद्रा ------------------- योग निद्रा एक परम् उत्कृष्ट निद्रा है, इसका अभ्यास हो जाने से मनुष्य के त्रिदोष सम्यक अवस्था में हो जाते हैं और व्यक्ति आदर्श स्वास्थ्य एवम् सौन्दर्य से युक्त रहता हुआ अतिशय सुखी, शांत ,प्रसन्न और आनंदित रहता है । योग निद्रा के लाभ =========== 1. योग निद्रा के अभ्यास से शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनाव समाप्त हो जाते हैं । 2. एक - एक अंग की निष्क्रियता दूर होकर , उसमें नई चेतना और नई शक्ति का संचार होता है । 3. शरीर, मन और मस्तिष्क के रोग जैसे :- तनाव , मधुमेह , रक्तचाप , ह्रदय रोग तथा कमजोरी आदि से छुटकारा मिल जाता है । 4. योग निद्रा के अभ्यास से मन पर नियंत्रण होने लगता है । मन को स्थिर करके बहुत सी शक्तियां और सिद्धियाँ प्राप्त हो जातीं हैं । 5. योग निद्रा के अभ्यास से व्यक्ति में आलस्य नहीं रहता है, वह सदा सक्रिय रहता है । कार्य करने की शक्ति उसमें बराबर बनी रहती है । 6. योग निद्रा अंतर्मन में उतरने की सर्वसुलभ क्रिया है । इसके अभ्यास से व्यक्ति को निर्मलता , निश्चलता एवम् शांति प्राप्त होती है तथा मन , मष्तिष्क और स्नायु मंडल को शान्ति एवं शक्ति मिलती है । 7. इसके अभ्यास से व्यक्ति जहाँ अंतर्मन में गहरे उतर सकता है, वहीं साधना की ऊंची उड़ान भी भर सकता है और तन-मन में अद् भुद ताजगी एवं आनंद का अनुभव कर सकता है । 8. अभ्यास परिपक्व होने पर बहुत से रहस्य व्यक्ति के समक्ष उजागर होते जाते हैं । @सावधान +++++++ यह योग निद्रा पूर्णत: लेखनीबद्ध नहीं हो सकती है । ये एक अत्यंत ही प्रभावशाली योग है , इसे किसी विशेषज्ञ के निर्देशन में सीख लेना चाहिए ।।
Thursday, 4 June 2015
Tuesday, 2 June 2015
हर विचार एक बीज है – Every Thought is a Seed| हमारे पास दो तरह के बीज होते है सकारात्मक विचार (Positive) एंव नकारात्मक विचार (Negative Thoughts) है, जो आगे चलकर हमारे दृष्टिकोण एंव व्यवहार रुपी पेड़ का निर्धारण करता है| हम जैसा सोचते है वैसा बन जाते है (What we think we become) इसलिए कहा जाता है कि जैसे हमारे विचार होते है वैसा ही हमारा आचरण होता है| यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने दिमाग रुपी जमीन में कौनसा बीज बौते है| थोड़ी सी चेतना एंव सावधानी से हम कांटेदार पेड़ को महकते फूलों के पेड़ में बदल सकते है|
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